श्रद्धा और आस्था का प्रतीक महथिन माई का मंदिर भोजपुर जिला मुख्यालय से करीब 25-30 किलोमीटर पश्चिम, आरा-बक्सर रेल मार्ग पर बिहियाँ स्टेशन से लगभग एक किलोमीटर पूरब रेल पटरी के किनारे दक्षिण स्थित है | सती शिरोमणि महथिन माई मंदिर के बारे में लोगो का कहना है कि यह मंदिर अत्याचार,अनाचार व कुकर्म पर सदाचार के विजय का प्रतिक है|
सिकरिया गांव के श्रीधर महंथ की बेटी थी महथिन।
माना जाता है कि उस इलाके का राजा हरिहो (हैहत) वंश का था, जिसका नाम रणपाल था। अत्यंत दुराचारी,अत्याचारि था। वह उधर से गुजरने वाली हर नई-नवेली दुल्हनों की डोली पहले अपने पास मंगवा लेता था, जब सिकरिया गांव के श्रीधर महंथ की बेटी की डोली उस रास्ते से सोंन नदी के पास तुलसी हरीग्राम की ओर जा रही थी, तो राजा रणपाल के सैनिको ने डोली रोक ली और महल की ओर चलने को कहा, जिसका महथिन ने विरोध किया| जब सैनिको ने जबरदस्ती की तो महथिन ने क्रोधित हो कर राजवंश के नाश होने का शाप दे दिया। बताया जाता है की इस घटना के बाद महथिन की डोली में स्वतः आग लग गई, वह सती हो गई और घटना के बाद हरिहो (हैहत) वंश का समूल नाश भी हो गया। तब शाहाबाद में उस वंश का नाश हो गया।
महथिन माई के बारे में चमत्कार से जुड़े कई किस्से आज भी सुने जाते हैं। कहा जाता है कि एक अंग्रेज अधिकारी जो बिहियाँ से गुजरने वाला रेल लाइन बिछवा रहा था, वह कुष्ट रोग से पीड़ित था। रेल लाइन महथिन माई के मिट्टीनुमा चबूतरे के ऊपर से होकर गुजरना था। बताया जाता है दिन में लाइन बिछता और रात में उखड़ा पाया जाता। परेशान अंग्रेज अफसर को सपना आया कि लाइन टेढ़ा करके ले जाओ तुम्हारा कुष्ट रोग दूर हो जाएगा,और काम भी हो जाएगा। उसने ऐसा किया,और हुआ भी। आज भी महथिन माई मंदिर के समीप रेल लाइन टेढ़ा होकर हीं गुजरा है।
मंदिर गर्भगृह में महथिन माई का "पिंडी" स्थापित है तथा उनके अगल बगल में दो और "पडियाँ" है, पिंडियों के बारे में कहा जाता है वो उनकी सहायिकाओं की प्रतीक है। श्रद्धालु उनकी भी पूजा करते है
वैसे तो इस महथिन माई मंदिर में हमेशा श्रद्धालुओं ताँता लगा रहता है पर सप्ताह में दो दिन सोमवार एवं शुक्रवार को यहां विशेष मेला लगता है | यहां लोग अपनी-अपनी मन्नते मांगने दूर-दूर से आते है | देवी सती शिरोमणि महथिन माई को लेकर श्रद्धालु महिलाओं की धारणा है कि इनकी आराधना से सुहाग सुरक्षित रहता है |
लग्न मुहूर्त के अलावा सालो भर यहां ब्याह का आयोजन होता है जिसमें सैकड़ों जोड़े महथिन माई को साक्षी मानकर दांपत्य सूत्र में बंधते है। यहां शादियां बिना दहेज और फिजूल खर्ची के सम्पन्न होती है।
महथिन माई मंदिर और महथिन माई देवी के रूप में इस क्षेत्र में विख्यात है | मंदिर के प्रवेश द्वार से अंदर परिसर में प्रवेश करते ही बायें तरफ हनुमान मंदिर व शिव मंदिर तथा दाहिने तरफ राम जानकी मंदिर व शनि देव का छोटा मन्दिर स्थित है। मुख्य मंदिर के गर्भ गृह में एक चबूतरा है जहां बराबर एक चौमुख दिया जलते रहता है। चबूतरे पर बीचो-बीच दो गोलाकार पीतल का परत चढ़ाया हुआ महथिन मां का प्रतीक चिह्न है।
इसके अलावा सरकारी स्तर पर धर्मशाला,शौचालय तथा अब स्थानीय रामको कम्पनी द्वारा शौचालय का निर्माण कराया गया है वहीं मनौती पूरी होने पर श्रद्धालु ने भव्य यात्री शेड का निर्माण कराये है।
मनोकामनापूर्ण होने पर चुनरी चढ़ाती है महिलायें।
लोगों का कहना है कि वर्षो पूर्व यहां महुआ के पेड़ के नीचे खुले आकाश में मिट्टी का एक चबूतरा था जिस पर महथिन मां की पूजा की जाती थी। मंदिर कब बना और किसने बनवाया इसके समय और काल पर इतिहास में कुछ भी दर्ज नहीं है। हालांकि गर्भ गृह के प्रवेश द्वार पर दायें-बायें बोलचाल की भोजपुरी भाषा और टूटी-फूटी चौपाई दोहों के रूप में सती शिरोमणि महथिन माई के पुण्य प्रताप से संबंधित अनेक चमत्कारिक किससे अंकित है। शादी ब्याह के मौसम में नव विवाहिता जोड़े यहां ‘कंकन’ छुड़ाने आते है। इधर कुछ वर्षो से उक्त मंदिर शादी विवाह के महत्वपूर्ण स्थल के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुका है। यहां प्रति वर्ष सैकड़ों जोड़े आते रहे है तथा महथिन माई को साक्षी मानकर दाम्पत्य सूत्र में बंधते हैं | कोई यहा मन्नत मांगने आता है तो कोई उसे पूरा होने पर चढ़ावे के लिए आता है| सती शिरोमणि महथिन माई मंदिर पर लोगो का विश्वाश हैं की इनके पूजा करने से सुहागिन का सुहाग हमेशा बना रहता है।